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रघुवंशम् • अध्याय 14 • श्लोक 17
तथैव सुग्रीवबिभीषणादीनुपाचरत्कृत्रिमसंविधाभिः । संकल्पमात्रोदितसिद्धयस्ते क्रान्ता यथा चेतसि विस्मयेन॥
उसी प्रकार उसने सुग्रीव, विभीषण आदि का भी आदर किया, जहाँ केवल संकल्प से ही सिद्धियाँ प्रकट हो जाती थीं, जिससे वे आश्चर्य से अभिभूत हो गए।
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