प्रासादकालागुरुधूमराजिस्तस्याः पुरो वायुवशेन भिन्ना । वनान्निवृत्तेन रघूत्तमेन मुक्ता स्वयं वेणिरिवाबभासे॥
महलों से उठती अगुरु धूम की रेखाएँ वायु से बिखरती हुई, वन से लौटे रघुश्रेष्ठ के सामने ऐसी प्रतीत हो रही थीं मानो स्वयं खुली हुई वेणी हों।
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