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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 7
पक्षच्छिदा गोत्रभिदात्तगन्धाः शरण्यमेनं शतशो महीध्राः । नृपा इवोपप्लविनः परेभ्यो धर्मोत्तरं मध्यममाश्रयन्ते ॥
इन्द्र द्वारा पर्वतों के पंख काटे जाने पर अनेक पर्वत इस समुद्र में शरण लेते हैं, जैसे राजा संकट में धर्म का आश्रय लेते हैं।
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