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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 63
सेयं मदीया जननीव तेन मान्येन राज्ञा सरयूर्वियुक्ता । दूरे वसन्तं शिशिरानिलैर्मां तरंगहस्तैरुपगूहतीव ॥
यह सरयू मुझे अपनी जननी के समान लगती है, जो दूर रहते हुए भी अपनी शीतल वायु और तरंगों के हाथों से मुझे आलिंगन करती हुई प्रतीत होती है।
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