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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 52
वीरासनैर्ध्यानजुषामृषीणाममी समध्यासितवेदिमध्याः । निवातनिष्कम्पतया विभान्ति योगाधिरूढा इव शाखिनोऽपि ॥
ये वृक्ष, जिनके नीचे ध्यान में लीन ऋषि बैठे हैं, बिना वायु के स्थिर रहकर ऐसे शोभित होते हैं, मानो योग में स्थित हों।
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