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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 48
एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा सरिद्विदूरान्तरभावतन्वी । मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे मुक्तावली कण्ठगतेव भूमेः ॥
यह शांत और स्वच्छ प्रवाह वाली मन्दाकिनी नदी पर्वत के पास ऐसी प्रतीत होती है, जैसे पृथ्वी के गले में मोतियों की माला हो।
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