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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 45
अदः शरण्यं शरभङ्गनाम्नस्तपोवनं पावनमाहिताग्नेः । चिराय संतर्प्य समिद्भिरग्निं यो मन्त्रपूतां तनुमप्यहौषीत् ॥
यह शरभंग मुनि का पवित्र आश्रम है, जिसने अग्नि को समिधाओं से संतुष्ट कर अपने मंत्रशुद्ध शरीर को भी उसमें अर्पित कर दिया था।
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