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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 43
एषोऽक्षमालावलयं मृगाणां कण्डूयितारं कुशसूचिलावम् । सभाजने मे भुजमूर्ध्वबाहुः सव्येतरं प्राध्वमितः प्रयुङ्क्ते ॥
यह तपस्वी अपनी अक्षसूत्रमाला और कुश से बने उपकरण से मृगों की सेवा करता हुआ मुझे सम्मान देने के लिए अपना दायाँ हाथ उठाकर आशीर्वाद देता है।
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