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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 41
हविर्भुजामेधवतां चतुर्णां मध्ये ललाटंतपसप्तसप्तिः । असौ तपस्यत्यपरस्तपस्वी नाम्ना सुतीक्ष्णश्चरितेन दान्तः ॥
चारों यज्ञाग्नियों के मध्य स्थित यह सुतीक्ष्ण नामक तपस्वी तप कर रहा है, जिसका तप सूर्य के समान प्रखर है और जिसका आचरण अत्यंत संयमित है।
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