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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 33
अमूर्विमानान्तरलम्बिनीनां श्रुत्वा स्वनं काञ्चनकिङ्किणीनाम् । प्रत्युद्व्रजन्तीव खमुत्पतन्त्यो गोदावरीसारसपङ्क्तयस्त्वाम् ॥
इन स्वर्ण किण्किणियों की ध्वनि सुनकर गोदावरी के सारसों की पंक्तियाँ आकाश में उड़ती हुई मानो तुम्हारा स्वागत करने को उठ रही हैं।
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