अत्रावियुक्तानि रथङ्गनाम्नामन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि । द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते मया प्रिये सस्मितमीक्षितानि ॥
हे प्रिये, यहाँ चक्रवाक पक्षियों के जोड़े एक-दूसरे को कमल के केसर देते हुए दूर-दूर रहते हुए भी मैंने मुस्कराकर देखे थे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।