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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 31
अत्रावियुक्तानि रथङ्गनाम्नामन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि । द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते मया प्रिये सस्मितमीक्षितानि ॥
हे प्रिये, यहाँ चक्रवाक पक्षियों के जोड़े एक-दूसरे को कमल के केसर देते हुए दूर-दूर रहते हुए भी मैंने मुस्कराकर देखे थे।
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