गन्धश्च धाराहतपल्वलानां कादम्बमर्धोद्गतकेसरं च । स्निग्धाश्च केकाः शिखिनां बभूवुर्यस्मिन्नसह्यानि विना त्वया मे ॥
यहाँ वर्षा से भीगे गड्ढों की सुगंध, आधे खिले कदम्ब के पुष्प और मयूरों की मधुर ध्वनि मुझे तुम्हारे बिना असह्य लगती थी।
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