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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 22
अमी जनस्थानमपोढविघ्नं मत्वा समारब्धनवोटजानि । अध्यसते चीरभृतो यथास्वं चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ॥
ये तपस्वी जनस्थान को विघ्नरहित समझकर नए आश्रम बनाने लगे हैं और अपने-अपने त्यागे हुए आश्रमों में पुनः निवास कर रहे हैं।
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