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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 20
असौ महेन्द्रद्विपदानगन्धिस्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः । आकाशवायुर्दिनयौवनोत्थानाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
यह आकाशवायु, जो इन्द्र के हाथियों की सुगंध से युक्त और तीनों मार्गों के जल से शीतल है, दिन की गर्मी से उत्पन्न तुम्हारे मुख के पसीने को सुखा रही है।
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