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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 18
कुरुष्व तावत्करभोरु पश्चान्मार्गे मृगप्रेक्षिणि दृष्टिपातम् । एषा विदूरीभवतः समुद्रात्सकानना निष्पततीव भूमिः ॥
हे हरिणी-सी दृष्टि वाली, अब पीछे मुड़कर मार्ग को देखो; यह भूमि समुद्र से दूर होती हुई वन सहित मानो निकलती हुई प्रतीत हो रही है।
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