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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 16
वेलानिलः केतकरेणुभिस्ते संभावयत्याननमायताक्षि । मामक्षमं मण्डलकालहानेर्वेत्तीव बिम्बाधरबद्धतृष्णम् ॥
हे विशाल नेत्रों वाली, तट की वायु केतकी के पराग से तुम्हारे मुख का सत्कार कर रही है, मानो वह मेरी अधरों की लालसा को समझती हो।
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