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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 12
वेलानिलाय प्रसृता भुजंगा वहोर्मिविस्फूर्जथुनिर्विशेषाः । सूर्यांशुसंपर्कविवृद्धरागैर्व्यज्यन्त एते मणिभिः फणस्थैः ॥
तट की हवा से फैले हुए सर्प तरंगों के साथ मिलकर लहराते हैं और सूर्यकिरणों से लाल हुए उनके फणों के मणि चमक उठते हैं।
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