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रघुवंशम् • अध्याय 13 • श्लोक 1
अथात्मनः शब्दगुणं गुणज्ञः पदं विमानेन विगाहमानः । रत्नाकरं वीक्ष्य मिथः स जायां रामाभिधानो हरिरित्युवाच ॥
तब गुणों के ज्ञाता राम विमान में आकाश के अपने स्वभाव को अनुभव करते हुए समुद्र को देखकर अपनी पत्नी से बोले—मैं ही हरि हूँ, राम नाम से प्रसिद्ध।
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