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रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 98
तद्व्योम्नि शतधा भिन्नं ददृशे दीप्तिमन्मुखम् । वपुर्महोरगस्येव करालफलमण्डलम्॥
वह आकाश में सैकड़ों टुकड़ों में बिखरकर ऐसे चमकने लगा, जैसे किसी विशाल सर्प का भयंकर फन फैल गया हो।
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