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रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 95
अयःशङ्कुचितां रक्षः शतघ्नीमथ शत्रवे । हृतां वैवस्वतस्येव कूटशाल्मलिमक्षिपत्॥
तब राक्षस ने लोहे के शूलों से युक्त शतघ्नी को शत्रु पर ऐसे फेंका, मानो यमराज का भयानक अस्त्र हो।
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