स प्राप हृदयन्यस्तमणिस्पर्शनिमीलितः । अपयोधरसंसर्गां प्रियालिङ्गननिर्वृतिम्॥
राम ने उस रत्न को हृदय से लगाकर आँखें बंद कर लीं और मानो प्रिय के आलिंगन का सुख अनुभव किया।
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