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रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 57
वधनिर्धूतशापस्य कबन्धस्योपदेशतः । मुमूर्च्छ सख्यं रामस्य समानव्यसने हरौ॥
कबन्ध के वध से उसके शाप से मुक्त होने पर उसके उपदेश से राम की मित्रता सुग्रीव से हुई, जो समान दुःख से पीड़ित था।
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