मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 104
रघुपतिरपि जातवेदोविशुद्धां प्रगृह्य प्रियां प्रियसुहृदि बिभीषणे संगमय्य श्रियं वैरिणः । रविसुतसहितेन तेनानुयातः ससौमित्रिणा भुजविजितविमानरत्नाधिरूढः प्रतस्थे पुरीम्॥
रघुनाथ ने अग्नि द्वारा शुद्ध की गई अपनी प्रिय सीता को ग्रहण कर, शत्रु की लक्ष्मी को प्रिय मित्र विभीषण को सौंपकर, सुग्रीव और लक्ष्मण के साथ विजित विमान पर आरूढ़ होकर अपनी नगरी की ओर प्रस्थान किया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें