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रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 100
बालार्कप्रतिमेवाप्सु वीचिभिन्ना पतिष्यतः । रराज रक्षःकायस्य कण्ठच्छेदपरम्परा॥
कटे हुए सिरों की वह पंक्ति जल में गिरते हुए उदित होते सूर्य के समान चमक रही थी, जैसे तरंगों में बिखरती किरणें।
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