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रघुवंशम् • अध्याय 12 • श्लोक 10
राजापि तद्वियोगार्तः स्मृत्वा शापं स्वकर्मजम् । शरीरत्यागमात्रेण शुद्धिलाभमन्यत॥
राजा भी उसके वियोग से दुःखी होकर अपने कर्मजन्य शाप को स्मरण करते हुए शरीर त्याग को ही शुद्धि का उपाय मानने लगे।
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