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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 92
तस्मिन्गते विजयिनं परिरभ्य रामं स्नेहादमन्यत पिता पुनरेव जातम् । तस्याभवत्क्षणशुचः परितोषलाभः कक्षाग्निलङ्घिततरोरिव वृष्टिपातः ॥
उसके जाने पर पिता ने विजयी राम को स्नेहपूर्वक आलिंगन किया और मानो उसे पुनः जन्मा हुआ समझा; उनका क्षणिक शोक ऐसे शांत हो गया जैसे वनाग्नि से जले वृक्ष पर वर्षा पड़ने से शांति मिलती है।
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