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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 83
तं कृपामुदुरवेक्ष्य भार्गवं राघवः स्खलितवीर्यमात्मनि । स्वं च संहितममोघमाशुगं व्याजहार हरसूनुसंनिभः ॥
उस भार्गव को दीन अवस्था में देखकर राम ने, जिनका पराक्रम अब क्षीण हो चुका था, करुणा से युक्त होकर अपने अचूक बाण के विषय में कहा।
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