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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 8
वीचिलोलभुजयोस्तयोर्गतं शैशवाच्चपलमप्यशोभत । तूयदागम इवोद्ध्यभिद्ययोर्नामधेयसदृशं विचेष्टितम् ॥
उनकी तरंगों की भाँति चलायमान भुजाओं में बाल्यकाल की चंचलता भी शोभा दे रही थी, और उनकी चेष्टाएँ उनके नाम के अनुरूप ही प्रतीत हो रही थीं।
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