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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 78
कातरोऽसि यदि वोद्गतार्चिषा तर्जितः परशुधारया मम । ज्यानिघातकठिनाङ्गुलिर्वृथा बध्यतामभययाचनाञ्जलिः ॥
यदि मेरी परशु की ज्वाला से भयभीत होकर तुम कातर हो, तो अपनी कठोर उँगलियों से धनुष न चढ़ाकर व्यर्थ ही अभय की याचना के लिए हाथ जोड़ लो।
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