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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 75
क्षत्रियान्तकरणोऽपि विक्रमस्तेन मामवति नाजिते त्वयि । पावकस्य महिमा स गण्यते कक्षवज्जलति सागरेऽपि यः ॥
क्षत्रियों का संहार करने वाला मेरा पराक्रम भी तब तक मेरी रक्षा नहीं कर सकता, जब तक मैं तुम्हें जीत न लूँ; जैसे अग्नि की महिमा वही मानी जाती है जो समुद्र में भी जल सके।
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