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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 71
क्षत्रजातमपकारवैरि मे तन्निहत्य बहुशः शमं गतः । सुप्तसर्प इव दण्डघट्टनाद्रोषितोऽस्मि तव विक्रमश्रवात् ॥
मैं क्षत्रियों के अपराधों का शत्रु हूँ और उन्हें बार-बार मारकर शांत हुआ था; परंतु तुम्हारे पराक्रम का समाचार सुनकर मैं सोए हुए सर्प की भाँति दंड के आघात से पुनः क्रोधित हो उठा हूँ।
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