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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 63
तेजसः सपदि राशिरुत्थितः प्रादुरास किल वाहिनीमुखे । यः प्रमृज्य नयनानि सैनिकैर्लक्षणीयपुरुषाकृतिश्चिरात् ॥
तभी सेना के अग्रभाग में तेज का एक पुंज प्रकट हुआ, जिसे सैनिकों ने आँखें मलकर देखा और जो धीरे-धीरे स्पष्ट पुरुषाकार में दिखाई दिया।
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