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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 58
तस्य जातु मरुतः प्रतीपगा वर्त्मसु ध्वजतरुप्रमाथिनः । चिक्लिशुर्भृशतया वरूथिनीमुत्तटा इव नदीरयाः स्थलीम् ॥
मार्ग में प्रतिकूल वायु ध्वजों और वृक्षों को हिलाते हुए उनकी सेना को ऐसे व्याकुल कर रही थी, जैसे उफनती नदियाँ किनारों को तोड़ देती हैं।
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