अन्वियेष सदृशीं स च स्नुषां प्राप चैनमनुकूलवाग्द्विजः । सद्य एव सुकृतां हि पच्यते कल्पवृक्षफलधर्मि काङ्क्षितम् ॥
राजा ने उपयुक्त वधू की खोज की और अनुकूल वचन बोलने वाले ब्राह्मण को भी प्राप्त किया; क्योंकि पुण्यवानों की इच्छाएँ कल्पवृक्ष के फल के समान शीघ्र ही पूर्ण होती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।