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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 42
एवमाप्तवचनात्स पौरुषं काकपक्षकधरेऽपि राघवे । श्रद्दधे त्रिदशगोपमात्रके दाहशक्तिमिव कृष्णवर्त्मनि ॥
ऋषि के वचनों पर विश्वास करके जनक ने काकपक्ष धारण किए हुए राम में भी ऐसा पराक्रम माना, जैसे छोटे से अंगारे में भी जलाने की शक्ति होती है।
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