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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 31
तौ प्रणामचलकाकपक्षकौ भ्रातराववभृथाप्लुतो मुनिः । आशिषामनुपदं समस्पृशद्दर्भपाटलतलेन पाणिना ॥
प्रणाम करते समय जिनके काकपक्ष हिल रहे थे, उन दोनों भाइयों को यज्ञ स्नान कर चुके मुनि ने दर्भ से स्पर्श करते हुए प्रत्येक चरण पर आशीर्वाद दिया।
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