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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 19
बाणभिन्नहृदया निपेतुषी सा स्वकाननभुवं न केवलाम् । विष्टपत्रयपराजयस्थिरां रावणश्रियमपि व्यकम्पयत् ॥
बाण से हृदय विदीर्ण होकर गिरती हुई वह राक्षसी केवल अपने वनभूमि को ही नहीं, बल्कि रावण की स्थिर प्रतीत होने वाली संपत्ति को भी कंपित कर गई।
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