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रघुवंशम् • अध्याय 11 • श्लोक 16
तीव्रवेगधुतमार्गवृक्षया प्रेतचीवरवसा स्वनोग्रया । अभ्यभावि भरताग्रजस्तया वात्ययेव पितृकाननोत्थया ॥
वह प्रचंड वेग से मार्ग के वृक्षों को हिलाती हुई, भयानक ध्वनि करती और प्रेतवस्त्र धारण किए हुए, जैसे आंधी पितरों के वन से उठती है, वैसे ही भरत के अग्रज पर टूट पड़ी।
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