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रघुवंशम् • अध्याय 10 • श्लोक 75
दशाननकिरीटेभ्यस्तत्क्षणं राक्षसश्रियः । मणिव्याजेन पर्यस्ताः पृथिव्यामश्रुबिन्दवः॥
उसी क्षण रावण के मुकुटों से गिरते हुए राक्षसों की शोभा के रत्न मानो पृथ्वी पर गिरे हुए आँसुओं के समान प्रतीत हो रहे थे।
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