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रघुवंशम् • अध्याय 10 • श्लोक 57
सा हि प्रणयवत्यासीत्सपत्न्योरुभयोरपि । भ्रमरी वारणस्येव मदनिस्यन्दरेखयोः॥
वह सुमित्रा दोनों ही पत्नियों के प्रति स्नेह रखने वाली थी, जैसे मधुमक्खी हाथी के मस्तक से बहने वाले मद की दोनों धाराओं पर समान रूप से मंडराती है।
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