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रघुवंशम् • अध्याय 10 • श्लोक 45
अचिराद्यज्वभिर्भागं कल्पितं विधिवत्पुनः । मायाविभिरनालीढमादास्यध्वे निशाचरैः॥
शीघ्र ही तुम यज्ञ करने वाले देवता विधिपूर्वक निर्धारित अपने भाग को फिर से प्राप्त करोगे, जिसे अब तक मायावी राक्षसों ने हरण कर रखा है।
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