इति प्रसादयामासुस्ते सुरास्तमधोक्षजम् । भूतार्थव्याहृतिः सा हि न स्तुतिः परमेष्ठिनः ॥
इस प्रकार देवताओं ने उस अधोक्षज भगवान को प्रसन्न किया; क्योंकि उनकी वाणी वस्तुतः सत्य कथन थी, न कि परमेश्वर की स्तुति मात्र।
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