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रघुवंशम् • अध्याय 10 • श्लोक 23
अभ्यासनिगृहीतेन मनसा हृदयाश्रयम् । ज्योतिर्मयं विचिन्वन्ति योगिनस्त्वां विमुक्तये॥
योगीजन अभ्यास से संयमित मन द्वारा हृदय में स्थित आपके ज्योतिर्मय स्वरूप का अन्वेषण करते हैं, ताकि उन्हें मुक्ति प्राप्त हो।
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