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रघुवंशम् • अध्याय 10 • श्लोक 17
रसान्तराण्येकरसं यथा दिव्यं पयोऽश्नुते । देशे देशे गुणेष्वेवमवस्थास्तवमविक्रियः॥
जैसे दिव्य जल विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रसों को धारण करता हुआ भी एक ही रहता है, वैसे ही आप विभिन्न गुणों और स्थानों में स्थित होकर भी अविकारी रहते हैं।
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