रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन् । तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः ॥
मैं अल्प वाणी-सामर्थ्य होते हुए भी रघुओं के वंश का वर्णन करूँगा, क्योंकि उनके गुण कानों में पड़कर मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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