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रघुवंशम् • अध्याय 1 • श्लोक 72
तस्मान्मुच्ये यथा तात संविधातुं तथार्हसि । इक्ष्वाकूणां दुरापेऽर्थे त्वदधीना हि सिद्धयः ॥
इसलिए हे तात, आप ऐसा उपाय करें जिससे मैं इस बंधन से मुक्त हो सकूँ, क्योंकि इक्ष्वाकुओं के लिए कठिन कार्यों की सिद्धि आप पर ही निर्भर है।
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