तया हीनं विधातर्मां कथं पश्यन्न दूयसे । सिक्तं स्वयमिव स्नेहाद्वन्ध्यमाश्रमवृक्षकम् ॥
हे विधाता, उस संतान के अभाव में मुझे देखकर आपको दुःख क्यों नहीं होता, जैसे स्नेहवश सींचा गया भी आश्रम का बाँझ वृक्ष।
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