लोकान्तरसुखं पुण्यं तपोदानसमुद्भवम् । संततिः शुद्धवंश्या हि परत्रेह च शर्मणे ॥
तप और दान से उत्पन्न पुण्य लोकों में सुख देता है, किन्तु शुद्ध वंश की संतान ही इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण का कारण होती है।
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