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रघुवंशम् • अध्याय 1 • श्लोक 68
सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा प्रजालोपनिमीलितः । प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोक इवाचलः ॥
मैं यज्ञों से शुद्ध आत्मा होते हुए भी संतान के अभाव से मानो ढका हुआ हूँ, जैसे लोकालोक पर्वत प्रकाश और अंधकार दोनों से युक्त होता है।
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