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रघुवंशम् • अध्याय 1 • श्लोक 61
तव मन्त्रकृतो मन्त्रैर्दूरात्प्रशमितारिभिः । प्रत्यादिश्यन्त इव मे दृष्टलक्ष्यभिदः शराः ॥
आपके मन्त्रों द्वारा शत्रु दूर से ही शांत हो जाते हैं, इसलिए मेरे लक्ष्यभेदी बाण मानो निष्फल होकर लौट जाते हैं।
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